मां की सेवा करें, सारे वास्तु-ग्रह दोष दूर हो जाएंगे – राष्ट्रसंत चंद्रप्रभजी

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-अहमदनगर में रचा नया इतिहास, हजारों लोगों के जीवन में घुली मिठास
अहमदनगर। राष्ट्रसंत चंद्रप्रभजी महाराज ने कहा कि जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ मानने की सीख हमें अपनी संस्कृती देती है। जिस मिट्टी में हमारा जन्म हुआ वह मिट्टी अगर स्वर्ग जैसी होती है, तो सोचो जिस मॉं के पेट से हमने जनम लिया उस मॉं की श्रेष्ठता तो सबसे उँची ही होती है। हम सब यह दुनिया सिर्फ और सिर्फ मॉं की बदोलत देख सकते हैं। हम सबको दुनियाभर की खुशियां, सुख, चैन सिर्फ मॉं की वजह से ही मिलते हैं। भगवान सब के पास पहंुच नहीं सकते, इसलिए भगवान ने मॉं का निर्माण किया है। मॉं अपने बच्चो के लिए जो त्याग और बलिदान करती है, उसकी कोई उपमा नही। इसलिए सबने भगवान की पूजा करने से पहले अपने मॉं की पूजा करनी चाहिए। इससे मिलने वाला आशीर्वाद, पुण्य अन्य किसी भी लाभ से बहुत बडे़ होते हैं। मॉं की सेवा ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाएं, आपकी सभी परेशानियां दूर हो जाएगी और जीवन में सुख ही सुख प्राप्त होगा।
राष्ट्रसंत चंद्रप्रभजी महाराज अहमदनगर में आयोजित दस दिवसीय दिव्य सत्संग समारोह के समापन पर माणिकनगर स्थित शिल्पा गार्डन में आयोजित सोचो, अगर मॉं न होती….विषय पर बोल रहे थे। सभी के दिलों को छू लेने वाले इस प्रवचन के अवसर पर राष्ट्रसंत ललितप्रभजी महाराज, डॉ. शांतिप्रियजी महाराज का भी सान्न्ध्यि रहा। सत्संग के लाभार्थी अशोक मुथा, शरद मुथा, हिरालाल पोखरणा, अनिल पोखरणा, सुभाषचंद्र पोखरणा, वसंत पोखरणा, निलेश पोखरणा, राजमल चंगेडिया, आदेश चंगेडिया, अमित अशोक मुथा, अमित पोखरणा आदि उपस्थित थे। समाज गौरव सी.ए. रमेश फिरोदिया और सौ. सविता फिरोदिया की तरफ से राष्ट्रसंतों का साहित्य सभी को उपहाररूप दिया गया। हजारों लोगों से खचाखच भरें प्रांगण में राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ जी की वाणी से मॉं के लिए निकलने वाले अमृतरुपी शब्दों को श्रवण करते हुए सभी बेहद प्रभावित हो गये थे।
मॉं की महत्ता का वर्णन करते हुए राष्ट्रसंत चंद्रप्रभजी ने कहा की दुनिया में मां की ममता की ताकत सर्वश्रेष्ठ होती है। श्रवणकुमार ने अपने नेत्रहीन माता-पिता की ऐसी सेवा की कि जग में उनका नाम आज भी आदरभाव से लिया जाता है। अगर किसी मॉं को ऐसा लगता है कि उसका बेटा भी श्रवणकुमार बने, तो सबसे पहले उस महिला को अपने पति को  श्रवणकुमार बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। तभी आगे जाके उसका बेटा उसके लिए श्रवणकुमार जैसा बनेगा। उन्होंने कहा कि मॉं-बाप अपने बच्चों को दुनिया के सब सुख देने का प्रयास करते हैं। उनकी परिस्थिती अच्छी नहीं होते हुए भी वो अपने बच्चों के लिए कुछ भी जोडतोड करते हैं इसलिए मॉं-बाप के प्रति कभी भी अनादर की भावना मन में नहीं आनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मरने के लिए अनेक मार्ग हैं लेकिन सभी ध्यान रखें कि जन्म लेने के लिए एक ही मार्ग है और वह है मॉं की कोख। त्रिशला मॉं की पेट से भगवान महावीर ने जन्म लिया, कौशल्या माता ने राम को जन्म दिया, जीजाबाई ने छत्रपती शिवाजी महाराज को जन्म दिया। मॉं ममता का महाकाव्य है। परमात्मा प्रत्यक्ष रुप से मिलना आसान नही है लेकिन परमात्मा स्वरुप मॉं सबको प्रत्यक्ष मिलती है।
उन्होंने कहा कि हम सब मंदिर जाकर भगवान की मूर्ति की पूजा-अर्चना करते हैं। सच बात तो यह है कि सभी मूर्ति मनुष्य ने बनाई है, पर माता-पिता ने हमको बनाया है इसलिए उनकी पूजा करना सच मे ईश्वर सेवा है। मॉं के हाथों में जो जादू होता है, वह और किसी चीज में नहीं होता। उसने अगर हमारे मुँह पर प्यारभरा हाथ फेरा तो हमारी सब मुसीबतें भाग खडी होती हैं। घर में अगर वास्तूदोष है, तो घर में मॉं की पूजा करो, सभी दोष अपने आप ही दूर हो जाएगें, किसी अलग उपाय की जरूरत नहीं। मनुष्य की भाग्यरेखा अपने हाथ में नही, मॉं की चरणरेखा में होती है। उसकी चरणधूल अपने माथे पर लगाओ तो जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे सुंदर शब्द मॉं है। हिमालय सबसे बडा माना जाता है। लेकीन मॉं की ममता उससे भी बडी होती है। क्योंकि हिमालय में पत्थर है, लेकिन मॉं की हृदय में सिर्फ और सिर्फ मोम जैसा प्रेम बसा है।
उनके भावभरे प्रवचन और भजनों को सुनकर उपस्थित श्रोताओं के दिल को छू लिया। सबने अपनी मॉं को याद किया। अनेक श्रावकों के आँख से आंसू निकल आए। सभी ने राष्ट्रसंत चंद्रप्रभजी और राष्ट्रसंत ललितप्रभजी का जयजयकार कर उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया।

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