लोकमान्य संत रूपमुनि का देवलोक गमन

जैन समाज में छाया शोक, जैतारण में  किया जाएगा अंतिम संस्कार

अहमदाबाद/जोधपुर। लोकमान्य संत रूपमुनि महाराज का शुक्रवार रात करीब 2.45 बजे अहमदाबाद के साल अस्पताल में देवलोकगमन हो गया। वे नब्बे वर्ष के थे और लम्बे समय से वे बीमार चल रहे थे। जैन मुनि के देवलोकगमन के समाचार के बाद देश के सभी हिस्सों में मौजूद उनके अनुयायियों और जैन समाज में शोक की लहर छा गई। उनका संभाग के पाली जिले में जैतारण में रविवार को दोपहर एक बजे अंतिम संस्कार किया जाएगा। मुनि नानेश और हरीश मुनि सहित कई श्रावक उनके साथ में हैं। अणुव्रत, अहिंसा और सद्भावना के प्रचार-प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
देश के जाने-माने जैनाचार्य संत रूपमुनि महाराज पिछले कुछ दिनों से अहमदाबाद के साल अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे। डॉक्टर लगातार उनकी देखभाल कर रहे थे। पिछले कई दिनों से उनकी हालत स्थिर बनी हुई थी, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। शुक्रवार रात 2.45 बजे उनका देवलोकगमन हो गया। यह समाचार फैलते ही समूचे जैन समाज में शोक की लहर फैल गई। देर रात उनके देहावसान की खबर के बाद साल अस्पताल में भारी संख्या में जैन समाज के लोग पहुंचे। शनिवार को दोपहर में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए पाली लाया गया। इधर उनके निधन की जैसे ही खबर लगी तो उनके भक्तों का पाली के जैतारण स्थित पावन धाम में पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। रविवार को उनका अंतिम संस्कार होगा।

 

एक युग का अंत
लोकमान्य रूप मुनि महाराज के निधन से एक युग का अंत हो गया है। तेजस्वी, ओजस्वी और प्रखर व्यक्तिव के धनी रूपचंद महाराज को ना केवल जैन समाज बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए मसीहा माना जाता था। उनको लाखो गायों को बचाने का श्रेय जाता है। अपनी सहज वाणी, निर्भीक विचार और सम सामायिक विषयों पर बेबाक राय रखने वाले संत रूपमुनि ने स्वर्गीय गुरु मिश्रीमल महाराज के पद चिंहों पर चलकर उनके नाम को और अधिक विस्तारित किया।

 

गाय बचाने का श्रेय
गोशाला के सरंक्षक के रूप में उनको लाखों गायों को बचाने का श्रेय जाता है। आज उनकी प्रेरणा से कई गोशाला संचालित हो रही है। उनका आंतरिक मन कबूतरों के उपकार के लिए व्याकुल रहता था। अपने छोटे से गांव नाड़ोल में जन्म लेने वाले संत रूपमुनि ने अत्यंत अल्प आयु में ही दीक्षा ग्रहण कर ली थी। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि कोई भले ही उनसे बीस साल बाद मिलता तो वे उसको फौरन पहचान लेते थे। जैन ग्रंथों के जानकार, आसू कवि संत रूपमुनि कि जुबान पर मां सरस्वती की महती कृपा थी।

 

अनूठी थी व्याख्यान शैली
लगता ही नहीं था कि वे व्याख्यान दे रहे है बल्कि ऐसा लगता था जैसे श्रोताओ से सीधे मुखातिब हो रहे है। उनकी प्रवचन शैली सहज और दिल की गहराई को छू लेने वाली थी। वे बेहद दयालु थे। सारा जीवन समाज के चाहे किसी भी संप्रदाय के व्यक्ति हो, सभी की भलाई के लिए समर्पित थे। सही मायनों में वे कुछ चंद संतों में से एक थे जिन्होंने कभी संप्रदाय वाद नहीं अपनाया।
जोधपुर में आज ही के दिन एक साल पहले हुआ था चातुर्मास मंगल प्रवेश
उनका राजस्थान से गहरा नाता रहा है। वे मारवाड़ भी आते रहे है। उनका जोधपुर से भी जुड़ाव रहा है। रूप मुनि का पिछले साल जोधपुर में ठीक एक साल पहले आज ही के दिन 18 अगस्त 2017 को चातुर्मास मंगल प्रवेश हुआ था। श्रावकों और श्राविकाओं ने पलक पावड़े बिछाए थे और मंगल गीत गाए गए थे। चातुर्मास के दौरान लोग उनकी एक झलक देखने और उनका सान्निध्य पाने के लिए लालयित रहते थे।

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