अस्पताल ने किया अनूठे हृदय रोग का इलाज

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-बिना सर्जरी किये ही डॉक्टरों ने हृदय रोगी को दिया नया जीवन
कोलकाता। बिहार के छोटे से गाँव बहादुरपुर निवासी 23 साल के कुमार यादव (बदला हुआ नाम) हृदय रोग से पीड़ित हैं, परिवार वालों को इस बात का पता तब लगा, जब कुमार महज चार साल के थे। वह बहुत जल्द थक जाते थे, उनके होंठ और उंगलियाँ नीली नजर आती थीं। डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि इस बीमारी के इलाज के लिए सर्जरी करनी पड़ेगी। हालांकि, पैसों की दिक्कत के कारण तब सर्जरी नहीं हो सकी। कुछ समय बाद थोड़ी दूर चलने या कुछ सीढ़ियां चढ़ने पर भी सांस लेने में दिक्कत होने लगी और हालत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी तो परिजन उन्हें बिहार के एक स्थानीय सरकारी अस्पताल ले गए। वहां डॉक्टरों ने उन्हें कोलकाता जाकर हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेने की सलाह दी।
मेडिका सुपरस्पेशलटी हॉस्पिटल में सीनियर कन्सलटेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राणा राठौर रॉय ने देखा कि युवा मरीज का शरीर नीला है तो आगे की जांच और जरूरी इलाज के लिए मरीज को मेडिका सुपरस्पेशलटी हॉस्पिटल में सीनियर कन्सलटेंट इंटरवेंशनल पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अनिल कुमार सिंघी के पास भेज दिया।
डॉ. अनिल कुमार सिंघी बताते हैं, कुमार का वजन 35 किलो से भी कम था। आक्सीजन सेचुरेशन महज 58 प्रतिशत था, जबकि सामान्यतया यह 98 से 100 प्रतिशत होता है। लंबे समय से हृदय रोग से पीड़ित रहने के कारण उसकी लंबाई 4.9 फीट थी, जो कि 23 साल के एक सामान्य आदमी की तुलना में काफी कम है।

छाती के एक्स-रे से पता चला कि कुमार का हृदय छाती के दायीं ओर स्थित है। इकोकार्डियोग्राम से जानकारी मिली कि हृदय के बायीं तरफ के चैंबर काफी बड़े हैं, लेकिन दो बड़े चैंबरों या बेंट्रिकल के बीच कोई छेद नहीं है। बबल कंट्रास्ट टेस्ट से इस बात की पुष्टि हो गई कि बायीं तरफ वाले फेफड़े की दो धमनियों, एक जिसमें अशुद्ध रक्त रहता है, और एक जिसमें शुद्ध रक्त रहता है, के बीच असामान्य संयोजन है। गड़बड़ी का पता लगाने कि लिए आखिरकार जब सीटी पल्मनरी एंजियोग्राम किया गया, तब पता लगा कि बायीं तरफ फेफड़े की धमनियां, जन्म से ही बाएं अट्रियम से एक असामान्य नली के जरिये जुड़ी हुई हैं। उस असामान्य नली का व्यास लगभग एक इंच था, जो कि शरीर की मुख्य धमनी के व्यास से भी बड़ा था। उसी के जरिये अशुद्ध रक्त और शुद्ध रक्त मिल जा रहे थे। और उसी वजह से कुमार की उंगलियां, नाखून और होठ नीले पड़ गए थे।
डॉ. सिंघी बताते हैं, इलाज के विकल्प वास्तव में बहुत चुनौतीपूर्ण थे। जोखिम कम करने के लिए हमने काफी विचार विमर्श किया कि क्या बिना सर्जरी किए ही पैर में नस के जरिए एक डिवाइस डालकर उस नली को बंद किया जा सकता है। आमतौर पर इस तरह के डिवाइस बेहद नरम, टिकाऊ और गैर क्षयकारी होते हैं।
प्रोसीजर को लोकल एनेसथिसिया के तहत अंजाम दिया गया। कैथ लैब ले जाकर कुमार के पैर की नसों के जरिए एक तार और छोटा कैथेटर डाला गया। एंजियोग्राम व मॉनीटर के जरिये नजर रखते हुए गड़बड़ी वाली जगह पर 24 एमएम लाइफटेक मस्कुलर वीएसडी डिवाइस लगाया गया। इसके तत्काल बाद कुमार का ऑक्सीजन सेचुरेशन 99 प्रतिशत हो गया, जो कि सामान्य है।
डॉ. सिंघी बताते हैं, प्रोसीजर पूरी तरह सफल रहा। प्रोसीजर के बाद 24 घंटे के भीतर ही युवा मरीज को जनरल वार्ड में भेज दिया गया। तीसरे दिन उसे अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई। कुमार को खून पतला करने वाली कुछ दवाएं खाने की सलाह दी गई है।
अब कुमार आराम से चल-फिर सकते हैं और जीवन का यथासंभव आनंद ले सकते हैं, जो कि पिछले करीब 20 साल तक उनके लिए नामुमकिन था।
सड़क के नीचे पाइप डालने वाले एक स्थानीय ठेकेदार के लिए काम करने वाले कुमार कहते हैं, अब मैं आसानी से सांस ले सकता हूं। मैं घर में कैद होकर रह गया था, लेकिन इलाज के बाद अब आराम से घूम-फिर सकता हूं। मेरे गांव में हाल के दिनों में 7 शादियां हुईं और उन सभी में बतौर बाराती मैंने जम कर डांस किया। मुझे उम्मीद है कि पांच साल में मैं अपनी बॉडी बना लूंगा और उसके बाद शादी करूंगा। तमन्ना है कि अपनी शादी में भी खूब नाचूं।
कुमार के बड़े भाई मुकेश ने कहा, इस प्रोसीजर और अस्पताल से जल्द छुट्टी मिल जाने के लिए हम मेडिका के बहुत आभारी हैं। पिछले चेकअप में कुमार का वजन बढ़कर 42 किलो हो गया था। 20 साल के दौरान कुमार जहां कहीं भी गया, मैं उसे अपनी साइकिल पर बिठा कर ले जाता था, क्योंकि हमारा परिवार परिवहन व्यय उठाने में सक्षम नहीं था। अब उसका रंग भी साफ हो गया है।
मेडिका सुपरस्पेशलटी हॉस्पिटल के चेयर डॉ. आलोक रॉय कहते हैं, जन्मजात हृदय रोग के इलाज की सफलता पर निश्चिच तौर पर हमारी नजर है। डॉक्टर बिना किसी बड़ी सर्जरी के ही डिवाइस प्रत्यारोपित कर रहे हैं। कुमार का स्वस्थ हो जाना, निश्चित रूप से मेडिका टीम का हौसला बहुत बढ़ाएगा।

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