मायावती हो सकती है सशक्त दावेदार

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बसपा प्रमुख मायावती के जन्म दिन पर एक पुस्तक लिखी थी- ‘सर्वसमाज की मसीहा कुमारी मायावती’ उसमें मैंने लिखा था कि कोई भी व्यक्ति जब इतिहास पुरूष बनता है तो उसे तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आलोचनायंे बर्दास्त करनी पड़ती है और अगर दुर्भाग्य से वह व्यक्ति महिला है तो उसका रास्ता और अधिक टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है। पुस्तक मे मैने लिखा था कि वैसे भी इतिहास पुरूष बनने का रास्ता कभी भी सीधा साधा नहीं होता बल्कि टेढ़े-मेढ़े रास्तो, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों, बेतरतीब मोड़ों तथा धूल-कीचड़ भरे रास्तों से गुजरते हुए एक ऐेसे मकाम पर पहुँचता है जहाँ एक साधारण सा व्यक्ति असाधारण व्यक्त्यिों की श्रेणी मे गिना जाने लगता है। दर असल व्यक्ति असाधारण जन्म से नहीं होता है बल्कि समाज के प्रति उसका नजरिया उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका और जज्बा तथा जीवन मूल्यों के प्रति उसका समर्पण ही उसे असाधारण बना देते है जो आगे चलकर भावी पीढ़ी का केवल मार्गदर्शक ,ही नही बनता बल्कि इतिहास पुरूष कहा जाने लगता है। सुश्री मायावती जी का ग्राफ इन दिनों फिर आसमान पर है, उनकी पार्टी से टिकट लेने वालों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है और यह तब से हुआ है जब से उत्तर प्रदेश मे सपा-बसपा का गठबन्धन हुआ है तथा दोनों ने 38-38 सीटांे पर मिलकर चुनाव लड़ने की भी घोषणा की है। राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि उत्तर प्रदेश मे भले ही संघर्ष त्रिकोणात्मक हो लेकिन इस गठबन्धन को ही सबसे अधिक यानि लगभग पचास सीटे मिलने वाली है। मायावती जी का ग्राफ इसलिए और बढ़ा है कि व अपने को ‘भावी प्रधानमंत्री’ मानकर चल रहीं है और इसके पीछे कुछ कारण भी है। इस वक्त अगर भाजपा के नरेन्द्र मोदी को छोड़ दिया जाये तो कांग्रेस के राहुल गाँधी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी तथा बसपा की मायावती प्रधानमंत्री की सबसे प्रबल दावेदार है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पार्टी का जनाधार सभी राज्यों में कुछ न कुछ जरूर है। इसके अलावा मध्य प्रदेश राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ के अलावा कुछ अन्य छोटे प्रदेशों में उनकी सरकार भी है इसके बावजूद ‘तीसरे मोर्चे’ के नेता उनकी पार्टी को बिना साथ लिये सरकार बनाने का सपना देख रहे है जिसमें बसपा प्रमुख सुश्री मायावती भी है। मायावती का मानना है कि अगर सपा-बसपा गठबन्धन को उत्तर प्रदेश में पचास सीटेे प्राप्त हो जाती है तो वे प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार हो जायेेगी ऐसे में कांग्रेस की मजबूरी होगी कि वह चाहते हुए भी भाजपा को रोकने के लिए तीसरे मोर्चेे का समर्थन करे। इसके बाद नम्बर आता है पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, सुश्री बनर्जी काफी समय से भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चे खोले हुए है। वे भी ऐसी सरकार बनने का ख्वाब देख रही है जिसमें विपक्ष के तमाम नेता प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी का समर्थन करें। यहाँ यह लिखना आवश्यक है कि पश्चिम बंगाल में वे एक सशक्त राजनेता के रूप में सक्रिय है लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उनकी स्वीकार्यता केवल पश्चिम बंगाल तक ही है उनकी मास अपील केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित है, अन्य राज्यों में उनका वोट बैंक नहीं है। जबकि मायावती इस वक्त देश की सबसे बड़ी दलित नेता है, उनकी अपील का असर देश के दूसरे राज्यों तक है। इतना ही नहीं जिस दलित समाज का वह प्रतिनिधित्व करती है उसका देश की आबादी में लगभग एक चैथाई हिस्सा है। मायावती चूँकि उत्तर प्रदेश से आती है जहाँ सबसे अधिक अस्सी सीटें है जबकि पश्चिम बंगाल में केवल 42 सीटें है। इतना ही नहीं मायावती को ममता बनर्जी की अपेक्षा क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करना ज्यादा आसान है क्योकि समर्थन देने वालों दलों की नजर उनके ‘वोट बैंक’ पर है जो आगे चलकर विधान सभा चूनाव में उनके काम आ सकता है। इसके अलावा मायावती की दावेदारी इसलिए और अधिक प्रबल है क्योंकि उनके सहयोगी सपा प्रमुख अखिलेश यादव स्वयं प्रधानमंत्री की दौड़ में है नहीं। वे मायावती को केन्द्र की राजनीति में भेजकर स्वयं उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ प्रदेश की बागडोर संभालना चाहते है। इतना ही नहीं मायावती की स्वीकार्यता मुस्लिम समाज मे भी है, अब यह अलग बात है उत्तर प्रदेश में चूँकि कांग्रेस भी मुख्य लड़ाई में आने का प्रयास कर रही है इसलिए मुस्लिम वोटों के बंटने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। मायावती और ममता बनर्जी दोनों के साथ एक दिक्कत जरूर है और वह यह है कि ‘सत्ता’ के लिए उनके लिए भारतीय जनता पार्टी भी अछूत नहीं है और यही दोनों का ‘डिमेेरिट’ है। यहाँ यह लिखना आवश्यक है कि ममता बनर्जी अगर अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में मन्त्री रह चुकी है तो मायावती भाजपा के सहयोग से तीन बार उ0प्र0 जैसे विशाल प्रदेश की मुख्यमन्त्री। इतना ही नहीं गुजरात दंगों के बाद हुए गुजरात विधानसभा के चुनाव में वे मोदी के लिए वोट मांगने भी गयी थी। वैसे इस वक्त मोदी के खिलाफ महागठबन्धन बनाने के अभियान में जुटे नेताओं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा, नेशनल कांग्रेस के फारूख अब्दूल्ला तथा चैधरी अजीत सिंह पूर्व में भाजपा के साथ रह चुके है और आगे किधर रहंेगे कहा नहीं जा सकता है। इन सब किन्तु परन्तु के बीच यह बात जोरदार ढंग से कही जा सकती है कि बसपा प्रमुख सुश्री मायावती तथा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तथा विपक्षी नेताओं के महागठबन्धन बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली ममता बनर्जी में मायावती का पलड़ा काफी भारी है और अगर आने वाले समय में वे विपक्षी एकता की सशक्त दावेदार बनकर उभरती है तो कतई ताज्जुब नहीं।

डाॅ ओ0 पी0 मिश्र

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