नाम संकीर्तन से पाप मुक्ति संभाव-आचार्य ऋषिकेश शास्त्री

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निम्बाहेड़ा। भागवत मर्मज्ञ आचार्य ऋषिकेश शास्त्री ने कहा कि संसार में नाम संकीर्तन मात्र से पाप मुक्ति संभव है। उन्होनें कहा कि दशरथ यानि 10 इन्द्रियों से संयुक्त भाव से भक्ति करने पर भव पार किया जा सकता है। आचार्य ऋषिकेश सोमवार को वेदपीठ एवं शोध संस्थान द्वारा परिसर में आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के तृतीय दिवस व्यासपीठ से संबोधित कर रहे थे। उन्होनें अजामिल उपाख्यान का विस्तार करते हुए कहा कि आजीवन पाप कर्म करने के बावजूद संत द्वारा उसके पुत्र का नामकरण नारायण कर देने मात्र पर अजामिल ने प्रतिदिन के कार्यो में पुत्रवत नारायण को पुकारा और जब उसका अंत समय आया तो उसने आद्रभाव से पुकारा के है नारायण मुझे बचा लें, उसकी यह पुकार पुत्र के प्रति थी, लेकिन नारायण ने उसे अपनी पुकार समझकर हरि दूतो को लेने भेज दिया।

वहां मौजूद यमदूत जब उसे यमलोक ले जाना चाह रहे थे, तब देव दूतो ने कहा कि अंत मति सोगति की भावना से अजामिल का स्थान देवलोक में होगा। इसी प्रसंग के बीच पाण्डाल में नर नारायण बन जाएगा, जो आत्म ज्योति जगाएगा भजन की प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। आचार्य ने कहा कि 28 नरको व पाप कर्म से बचने के लिए नाम स्मरण को ही जीवन का आधार बनाना होगा। उन्होनें मुनि शुकदेव एवं परिक्षित के प्रसंग में सप्त लोक का वर्णन करते हुए बताया कि शेषावतार कल्लाजी अपने शेष फणों के बीच केवल एक फण पर धरती को धारण करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे है। उसी भाव से हमें भी पृथ्वी लोक पर रहते हुए अपने धर्म का पालन करना चाहिए।

उन्होनें राजा भरत के तीन जन्मों का विस्तार करते हुए कहा कि राजा भरत जब गंडकी नदी तट पर पूजा कर रहे थे, तब वहां से सिंह के डर से भागी हिरणी का बच्चा नदी में गिर गया, जिसे घर लाने पर उसके प्रति उनकी आसक्ति हो गई, जिसके फलस्वरूप वे भक्ति को त्याग कर केवल हिरण का ध्यान रखने लगे। यहीं कारण है कि अंत में प्राण त्यागने पर उन्हें हिरण के रूप में जन्म लेना पड़ा, तब उन्हें अपने भक्ति मार्ग से विलग होने का पश्चाताप हुआ, तब वे हरि स्मरण करने लगे, जिसके फलस्वरूप अगले जन्म में वे जड भरत के रूप में प्रकरण हुए। नाम के साथ जड यानि मुर्खता का प्रयाय जुडने के बाद जड भरत ने सांसारिक आसक्ति को त्याग कर ईश्वरीय भक्ति को अपनाया और राहुगण को सांख्य ज्ञान कराया।

आचार्य ने कहा कि जीवात्मा परमात्मा से मिलने का प्रयास तो करता है, लेकिन भक्ति मार्ग को अन्तर मन से स्वीकारने पर ही सफलता संभव है। उन्होनें कहा कि मानव को सर्वज्ञ बनने के बजाय गुरू आज्ञा का पालन करना चाहिए। इस बीच क्या लेके आया बंदे क्या लेके जाएगा, दो दिन की जिन्दगी है भजन से वातावरण में जीवन के महत्व के भाव ऐसे प्रकट हुए कि श्रद्धालु तालियों से संगत करते हुए आनन्दित होते नजर आए। प्रारंभ में वेदपीठ के न्यासियों एवं कल्याण भक्तों द्वारा व्यासपीठ पूजन के साथ मुख्य आचार्य के रूप में ठाकुर श्री कल्लाजी की पूजा अर्चना की गई।

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